Friday, 22 April 2016

मरने के बाद क्या होता है ? दूसरी दुनिया के मृत आत्माओं से मुलाकात - परलोक के रहस्य - what happens after death

मरने के बाद क्या होता है ?
दूसरी दुनिया के मृत आत्माओं से संपर्क -
What Happens After Death ?

परिचय :- 
परलोक का मुख्य माध्यम मृत्यु है ! मतलब जब तक मृत्यु
नहीं हो जाती तब तक परलोक के दर्शन नहीं हो सकते , किन्तु वेद , तन्त्र
इत्यादि में पढ़ने को मिलता है कि मृत्यु को प्राप्त किये बिना भी परलोक
के विज्ञान को जाना जा सकता है ! योग तंत्र भी यही कहता है कि मृत्यु
को प्राप्त किये बिना भी परलोक के रहस्य को जाना जा सकता है !
परंतु मृत्यु के बाद क्या होता है इस रहस्य को जानना इतना आसान नहीं
है ! फिर यह उतना भी मुश्किल नहीं है ! अगर हम चाह ले तो अपने
अथक प्रयास और प्रबल इच्छा शक्ति से मृत्यु के बाद के रहस्य को जान
सकते है ! इस अदृश्य सीमा रेखा को पाप करने , रहस्यमय पारलौकिक
जगत में प्रवेश करने , तथा उसमें निवास करने वाले अपरिचित और
अज्ञात प्राणियों से सम्पर्क स्थापित करने के लिए कई साधन प्रचलित
है , लेकिन वे साधन पूर्ण रूप से पुष्ट और प्रमाणित नहीं है ! यदि केई
पुष्ट , प्रमाणित और विश्वसनीय मार्ग है तो वह एक मात्र योग तंत्र है !
योग तपस्या का मार्ग है ओर तंत्र साधना का मार्ग है ! पहले मार्ग में
सफलता कब मिलेगी यह केई निश्चित नहीं है ! दूसरा मार्ग बहुत ही
कठिन है ! लेकिन जहाँ तक सफलता का प्रश्न है , वह साधक की
योग्यता और संस्कार पर निर्भर करता है ! तंत्र में बहुत सी ऐसी
राजसी व तामसिक साधनाएँ है जिनमें सफलता प्राप्त होने पर उनकी
सहायता से एक सीमा तक परलोक (दूसरे लोक ) के सभी प्रकार के
आत्माओं से संपर्क स्थापित किया जा सकता है ! उनकी स्थिति ,
परिवेश को जाना जा सकता है ! लेकिन जहाँ तक उस अदृश्य सीमा
रेखा को पार करने और पारलौकिक जगत में प्रवेश करने का सवाल
है , वह समाधि द्वारा ही संभव है !


समाधि , योग की उच्चतम अवस्था है ! और उस उच्चतम अवस्था
को प्राप्त होने के लिए ध्यान में प्रवेश करना होगा ! उस अदृश्य और
रहस्यमय सीमा रेखा को पार करना मृत्यु के बाद ही संभव है !
इसलिए मृत्यु से परिचित होना आवश्यक है , जो जीते जी संभव
नहीं है ! यदि जीते जी संभव है तो एक मात्र समाधि द्वारा ! मृत्यु
और ध्यान दोनो की अवस्था समान है ! मृत्यु की तरह हम ध्यान में
भी हम धीरे-धीरे प्रवेश करते है ! जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जाते है
वैसे-वैसे एक एक वस्तु हमसे छूटती चली जाती है ! अन्त में ऐसा
क्षण आ जाता है कि हमें लगने लगेगा कि हमसे सब कुछ दूर हो गया
है , सब अलग हो गया है , यहाँ तक कि शरीर भी ! ऐसी अवस्था में
हम अपने शरीर को उसी प्रकार पड़े हुए देखते है जैसे कि किसी नदी
के किनारे किसी कि लावारिश लाश को देखते है !फिर भी लगेगा कि
हम है ! हमारा अस्तित्व है ! उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं
हुआ है ! और उसी के साथ हम अपने आपको सबसे अलग अनुभव
करते है ! ऐसा लगता है कि मानो हमारा अस्तित्व स्वतंत्र है ! किसी भी
वस्तु से उसका कोई संबंध नहीं है ! और जिस क्षण हमें ऐसा अनुभव
होता है , उसी क्षण हम मृत्यु के साक्षात्कार को जीते जी उपलब्ध हो
जाते है ! और फिर मृत्यु से कोई संबंध नहीं रह जाता है हमारा ! जब
हमारी मृत्यु की समय अवधि पूर्ण होने के बाद मृत्यु आएगी तो वह
हमारी मृत्यु नहीं होगी ! क्योंकि मृत्यु के आने के पहले ही हम अपने
आपको (सूक्ष्म शरीर) स्थूल शरीर से अलग कर लेंगे ! और वह स्थिति
हमारे जीवन का पड़ाव होगा , वस्त्र बदलने के समान होगा ! वस्त्र की
तरह शरीर को बदलकर नया शरीर स्वीकार कर लेंगे हम ! और आगे
की यात्रा पर निकल जाएंगे हम ! जो हमारे नए जन्म और नए जीवन
की यात्रा होगी !



बहुत चाहने और प्रयत्न करने पर भी ध्यान नहीं लगता है इसका क्या
कारण है ? ----  इसका मात्र एक कारण है मृत्यु का भय ! और ध्यान
मारने की प्रक्रिया है ! ध्यान की पूर्णावस्था में हम वहीं पहुँच जाते हैं
जहाँ एक मृत व्यक्ति पहुँचता है ! अन्तर मात्र केवल इतना ही होता है
कि मृत व्यक्ति वहाँ बेहोशी की अवस्था में पहुँचता है जबकि ध्यान के
द्वारा हम बिल्कुल जागृत और चैतन्य अवस्था में ! हमारे और एक मृत
व्यक्ति के विचारों में भी अन्तर होता है ! मृत व्यक्ति को पता नहीं होता
है कि 'क्या हो गया ?' शरीर कैसे हमसे छूट गया या अलग हो गयाऔर
वह कैसे बच गया ? परंतु हम सोचते है कि शरीर और हम (आत्मा )
एक दूसरे से अलग हो गए है ! शरीर तो नष्ट हो गया , लेकिन हम नष्ट
नहीं हुए ! हम पहले जैसे ही रहे !



अतः इसका सारांश यह है कि ध्यान की जो पूर्ण अवस्था है , वह है
समाधि ! उस अवस्था को दो  प्रकार से उपलब्ध हुआ जाता है ----
मर कर या समाधि में ! पहले प्रकार में हम बेहोश रहते हैं , चेतना
शून्य रहते हैं , इसलिए हम उसअदृश्य रेखा के पार कब चले जाते है ?
इसका कोई ज्ञान नहीं रहता है हमें ! जबकि दूसरे प्रकार में हम पूर्ण
तरह से होश में रहते है और पूर्ण चैतन्य में रहते है ! इसलिए हमें उस
अदृश्य रेखा को पार करने और पारलौकिक जगतमें प्रवेश करने का
पूरा पूरा अनुभव रहता है और जब हम समाधि से वापस लौटते है तो
वह ज्ञान और वह अनुभव जो हमने समाधि के अवस्था में अनुभव किए
वह हमारे साथ रहता है !


अगली पोस्ट में मैं आपको  रहस्यमय  लोक के बारे में विस्तार से
बताऊंगा !


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